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God of cricket | सचिन तेंदुलकर | सचिन तेंदुलकर के बारे में।

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  God of cricket 🏏 🏏        सचिन तेंदुलकर: क्रिकेट के भगवान परिचय सचिन तेंदुलकर केवल एक नाम नहीं, बल्कि क्रिकेट की दुनिया का एक ऐसा अध्याय हैं जिन्होंने खेल की परिभाषा ही बदल दी। उन्हें प्यार से 'मास्टर ब्लास्टर' और 'क्रिकेट का भगवान' कहा जाता है। भारतीय खेल इतिहास में उनका योगदान अतुलनीय है, और वे करोड़ों युवाओं के प्रेरणास्रोत हैं। प्रारंभिक जीवन सचिन रमेश तेंदुलकर का जन्म 24 अप्रैल 1973 को मुंबई, महाराष्ट्र में एक मध्यमवर्गीय मराठी परिवार में हुआ था। उनके पिता, रमेश तेंदुलकर, एक प्रसिद्ध मराठी उपन्यासकार थे और उनकी माता, रजनी तेंदुलकर, एक बीमा एजेंट थीं। बचपन में सचिन बहुत शरारती थे, इसलिए उनके बड़े भाई अजीत तेंदुलकर ने उनकी ऊर्जा को सही दिशा देने के लिए उन्हें क्रिकेट कोच रमाकांत आचरेकर के पास ले गए। शिवाजी पार्क में आचरेकर सर के मार्गदर्शन में सचिन ने क्रिकेट की बारीकियां सीखीं। क्रिकेट करियर की शुरुआत सचिन ने मात्र 16 वर्ष की आयु में 1989 में पाकिस्तान के खिलाफ अपने अंतरराष्ट्रीय करियर की शुरुआत की। उस समय वे दुनिया के सबसे खतरनाक गेंदबाजों, जैसे वसीम अक...

Virat Kohli Frist cenchury | विराट कोहली का पहला इंटरनेशनल शतक लगाने की कहानी #विराट #कोहली #शतक

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हैलो दोस्तों तो यहाँ विराट कोहली के पहले अंतरराष्ट्रीय शतक और उससे जुड़ी उस भावनात्मक कहानी का विस्तृत वर्णन है, जिसने न केवल एक 'रन मशीन' के उदय का संकेत दिया, बल्कि भारतीय क्रिकेट में टीम भावना की एक बेमिसाल मिसाल भी पेश की। ईडन गार्डन्स का वह ऐतिहासिक दिन: विराट कोहली का पहला शतक और गंभीर का बड़ा दिल क्रिकेट के इतिहास में कुछ पारियां ऐसी होती हैं जो सिर्फ रिकॉर्ड बुक्स में दर्ज नहीं होतीं, बल्कि वे एक नए युग की शुरुआत करती हैं। 24 दिसंबर 2009 की शाम, कोलकाता के ईडन गार्डन्स में खेली गई पारी ऐसी ही थी। यह वह दिन था जब दुनिया ने पहली बार विराट कोहली के बल्ले की असली गूंज सुनी थी। यह कहानी सिर्फ 107 रनों की नहीं है; यह कहानी एक युवा खिलाड़ी के आत्मविश्वास, दबाव में बिखरने के बजाय निखरने, और एक सीनियर खिलाड़ी (गौतम गंभीर) की दरियादिली की है। आज जब हम विराट कोहली को 'किंग कोहली' और 'चेज़ मास्टर' के रूप में जानते हैं, तो उस सफर की नींव इसी मैच में पड़ी थी। आइये, उस मैच और उससे जुड़ी कहानी को विस्तार से जानते हैं। 1. मैच की पृष्ठभूमि: दबाव और उम्मीदें साल 2009 में श्रीलंका...

Virat Kohli debut #virat #kohali #viral

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 विराट कोहली के शुरुआती करियर और उनके सफर से जुड़ी कुछ और बेहद दिलचस्प बातें आप सभी को बहुत पसंद आएंगी।  1. अंडर-19 वर्ल्ड कप का हीरो विराट कोहली के इंटरनेशनल डेब्यू की जमीन 2008 के अंडर-19 वर्ल्ड कप में तैयार हुई थी। उनकी कप्तानी में भारत ने मलेशिया में हुए वर्ल्ड कप को जीता था। उनकी आक्रामकता और नेतृत्व क्षमता ने वहीं से चयनकर्ताओं का ध्यान खींचा था। 2. डेब्यू सीरीज में संघर्ष और वापसी अपनी पहली सीरीज (श्रीलंका दौरा, 2008) में विराट ने 5 मैचों में कुल 159 रन बनाए थे। उन्होंने इसी सीरीज के चौथे मैच में अपना पहला अर्धशतक (54 रन) लगाया था। हालांकि, इसके बाद उन्हें टीम से ड्रॉप कर दिया गया था, लेकिन घरेलू क्रिकेट में अच्छे प्रदर्शन के बाद उन्होंने शानदार वापसी की। 3. 'चीकू' उपनाम के पीछे की कहानी विराट को उनके कोच और साथी खिलाड़ी 'चीकू' कहते हैं। यह नाम उन्हें उनके दिल्ली के कोच अजीत चौधरी ने दिया था। जब विराट ने अपने बाल छोटे कटवाए थे और उनके कान बड़े दिखने लगे थे, तो उनके कोच को वह 'चंपक' कॉमिक्स के किरदार चीकू खरगोश जैसे लगे थे। 4. सचिन तेंदुलकर का कंधा थामना 20...

NET jrf important questions | MCQ test | kahani | हिन्दी कहानी से जुड़े प्रश्न

 NET jrf important questions | MCQ test | kahani | हिन्दी कहानी से जुड़े प्रश्न  यह विडियो देखिए कितनी अच्छी जानकारी दी गई है। 

बदचलन बीवियों का द्वीप - कृष्ण बलदेव वैद

🥀🌼 बदचलन बीवियों का द्वीप - कृष्ण बलदेव वैद कृष्ण बलदेव वैद की बदचलन बीवियों का द्वीप (प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन, 2002) हिंदी साहित्य में एक अनूठा और प्रयोगात्मक कहानी संग्रह है, जो सोमदेव रचित प्राचीन संस्कृत ग्रंथ कथासरित्सागर की चयनित कहानियों का आधुनिक और समकालीन संदर्भों में पुनर्लेखन प्रस्तुत करता है। वैद, जो अपनी मौलिक भाषाई शैली और गैर-पारंपरिक कथन के लिए जाने जाते हैं, इस संग्रह में प्राचीन कथाओं को नए ढंग से प्रस्तुत करते हैं, जो पाठक को चमत्कृत करने के साथ-साथ गहरे सामाजिक और मनोवैज्ञानिक प्रश्न उठाती हैं। __ ▪️बदचलन बीवियों का द्वीप में बलदेव कृष्ण वैद ने कथासरित्सागर की कहानियों को आधार बनाकर उन्हें आधुनिक परिप्रेक्ष्य में ढाला है। संग्रह की कहानियाँ, जैसे "कलिंगसेना और सोमप्रभा की विचित्र मित्रता", पारंपरिक कथाओं को समकालीन भाषा, संवेदनाओं और जीवन-छवियों से जोड़ती हैं। वैद की शैली में एक खास तरह का व्यंग्य, हास्य और मनोवैज्ञानिक गहराई है, जो पात्रों के व्यवहार और समाज के नैतिक ढांचे पर प्रश्न उठाती है। पुस्तक का शीर्षक ही अपने आप में एक व्यंग्यात्मक टिप्पणी है, ...

राघव और महतु की कहानी, हिन्दी कहानी, चन्द्र कुमार

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**राघव और महतु की कहानी** *बचपन की दोस्ती, समय का इम्तिहान* एक छोटे से गाँव में दो दोस्त रहते थे — राघव और महतु। दोनों बचपन के साथी थे। मिट्टी में खेलना, तालाब में नहाना, आम के पेड़ पर चढ़ना — हर खुशी और ग़म में एक-दूसरे का साथ निभाते थे। राघव का परिवार गाँव के सबसे अमीर लोगों में से था। उसके पिता ज़मींदार थे, शहरों में भी उनका कारोबार था। वहीं महतु का परिवार गरीब था, उसका पिता मज़दूरी करता था। लेकिन इन फर्कों का कभी उनकी दोस्ती पर असर नहीं पड़ा। समय बदला। राघव शहर पढ़ने चला गया — अच्छे स्कूल, बड़ी डिग्रियाँ, और फिर विदेश में नौकरी। धीरे-धीरे उसका जीवन बदल गया। उसने कारोबार शुरू किया और सफल बिजनेसमैन बन गया। उधर महतु गाँव में ही रहा। उसने अपने पिता के साथ खेतों में काम किया, कई बार पेट काटा, लेकिन कभी ईमान और मेहनत से पीछे नहीं हटा। गाँव में लोग उसे इज्जत से देखते थे, भले ही उसकी जेब खाली हो। सालों बाद राघव एक सामाजिक प्रोजेक्ट के सिलसिले में गाँव लौटा। वो चमचमाती गाड़ी से उतरा, पीछे लोग थे, कैमरे थे, पर दिल में एक खालीपन था। गाँव की गलियों से गुज़रते हुए उसकी नज़र एक पेड़ के नीचे बैठक...

जीवन के कुछ पल, चन्द्र कुमार, कहानी

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 जीवन के कुछ पल  नदी के किनारे एक छोटा सी झोपड़ी थी, जिसमें एक प्रेमी युगल रहते थे। उनके नाम थे राजेश और राजेश्वरी। वे दोनों एक दूसरे से बेहद प्यार करते थे और हमेशा साथ में रहना चाहते थे। एक सुंदर दिन, जब सूरज अपनी पूरी चमक के साथ चमक रहा था, राजेश और राजेश्वरी नदी के किनारे बैठे थे। वे दोनों एक दूसरे की आँखों में देख रहे थे और मुस्कुरा रहे थे। राजेश राजेश्वरी का हाथ पकड़ लिया और कहा, "राजेश्वरी, तुम मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी खुशी हो। तुम बिना मेरी जिंदगी अधूरी है।" राजेश्वरी राजेश की आँखों में देखा और कहा, "राजेश, तुम भी मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी खुशी हो। तुम बिना मेरी जिंदगी अधूरी है।" वे दोनों एक दूसरे को देखकर मुस्कुरा रहे थे और नदी के किनारे बैठे थे। तभी एक छोटा सा पक्षी उनके पास आया और उन्हें देखकर चहचहाने लगा। राजेश और राजेश्वरी ने उस पक्षी को देखा और मुस्कुरा दिए। वे दोनों एक दूसरे के साथ खुश थे और नदी के किनारे बैठे थे, जहां वे अपने जीवन की सबसे खूबसूरत पलों का आनंद ले रहे थे। राजेश और राजेश्वरी ने अपने प्यार को एक नई दिशा दी और अपने जीवन की नई शुरुआत की। वे ...

आदिकाल / प्रकरण 2 अपभ्रंश काव्य, रामचंद्र शुक्ल

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  आदिकाल / प्रकरण 2 अपभ्रंश काव्य जब से प्राकृत बोलचाल की भाषा न रह गई तभी से अपभ्रंश साहित्य का आविर्भाव समझना चाहिए। पहले जैसे 'गाथा' या 'गाहा' कहने से प्राकृत का बोध होता था वैसे ही पीछे 'दोहा' या 'दूहा' कहने से अपभ्रंश या लोकप्रचलित काव्यभाषा का बोध होने लगा। इस पुरानी प्रचलित काव्यभाषा में नीति, श्रृंगार, वीर आदि की कविताएँ तो चली ही आती थीं, जैन और बौद्ध धार्माचार्य अपने मतों की रक्षा और प्रचार के लिए भी इसमें उपदेश आदि की रचना करते थे। प्राकृत से बिगड़कर जो रूप बोलचाल की भाषा ने ग्रहण किया वह भी आगे चलकर कुछ पुराना पड़ गया और काव्य रचना के लिए रूढ़ हो गया। अपभ्रंश नाम उसी समय से चला। जब तक भाषा बोलचाल में थी तब तक वह भाषा या देशभाषा ही कहलाती रही, जबवह भी साहित्य की भाषा हो गई तब उसके लिए अपभ्रंश शब्द का व्यवहार होने लगा। भरत मुनि (विक्रम तीसरी शताब्दी) ने 'अपभ्रंश' नाम न देकर लोकभाषा को 'देशभाषा' ही कहा है। वररुचि के 'प्राकृतप्रकाश' में भी अपभ्रंश का उल्लेख नहीं है। अपभ्रंश नाम पहले पहल बलभी के राजा धारसेन द्वितीय के शिलाल...

आदिकाल, प्रकरण 1 रामचंद्र शुक्ल

आदिकाल / प्रकरण 1 सामान्य परिचय दोस्तों यहां पर पिछले पांच भागों के बाद की जानकारी दी गई है, अगर आप चाहते हैं कि पिछले पांच भाग भी पढ़ें तो निम्नलिखित शीर्षक पर जाए:- महत्वपूर्ण लिंक्स  हिन्दी साहित्य का इतिहास, रामचंद्र शुक्ल, भाग 01 हिन्दी साहित्य का इतिहास, रामचंद्र शुक्ल भाग 02 हिन्दी साहित्य का इतिहास, रामचंद्र शुक्ल भाग 03 हिन्दी साहित्य का इतिहास, रामचंद्र शुक्ल भाग 04 हिन्दी साहित्य का इतिहास, रामचंद्र शुक्ल, भाग 05 प्राकृत की अंतिम अपभ्रंश अवस्था से ही हिन्दी साहित्य का आविर्भाव माना जा सकता है। उस समय जैसे 'गाथा' कहने से प्राकृत का बोध होता था वैसे ही 'दोहा' या 'दूहा' कहने से अपभ्रंश या प्रचलित काव्यभाषा का पद्म समझा जाता था। अपभ्रंश या प्राकृताभास हिन्दी के पयों का सबसे पुराना पता तांत्रिक और योगमार्गी बौध्दों की सांप्रदायिक रचनाओं के भीतर विक्रम की सातवीं शताब्दी के अंतिम चरण में लगता है। मुंज और भोज के समय (संवत् 1050) के लगभग तो ऐसी अपभ्रंश या पुरानी हिन्दी का पूरा प्रचार शुद्ध साहित्य या काव्य रचनाओं में भी पाया जाता है। अतः हिन्दी साहित्य का आदिक...

हिन्दी साहित्य का इतिहास, रामचंद्र शुक्ल, भाग 05 , काल विभाजन

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 कालक्रम दोस्तों यहां पर पिछले चार भागों के बाद की जानकारी दी गई है, अगर आप चाहते हैं कि पिछले चार भाग भी पढ़ें तो निम्नलिखित शीर्षक पर जाए:- महत्वपूर्ण लिंक्स  हिन्दी साहित्य का इतिहास, रामचंद्र शुक्ल भाग 01 हिन्दी साहित्य का इतिहास, रामचंद्र शुक्ल, भाग 02 हिन्दी साहित्य का इतिहास, रामचंद्र शुक्ल, भाग 03 हिन्दी साहित्य का इतिहास, रामचंद्र शुक्ल, भाग 04 जबकि प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब होता है, तब यह निश्चित है कि जनता की चित्तवृत्ति के परिवर्तन के साथ-साथ साहित्य के स्वरूप में भी परिवर्तन होता चला जाता है। आदि से अंत तक इन्हीं चित्तवृत्तियों की परंपरा को परखते हुए साहित्य परंपरा के साथ उनका सामंजस्य दिखाना ही 'साहित्य का इतिहास कहलाता है। जनता की चित्तवृत्ति बहुत कुछ राजनीतिक, सामाजिक, सांप्रदायिक तथा धार्मिक परिस्थिति के अनुसार होती है। अतः कारण स्वरूप इन परिस्थितियों का किंचित् दिग्दर्शन भी साथ ही साथ आवश्यक होता है। इस दृष्टि से हिंदी साहित्य का विवेचन करने में यह बात ध्यान में रखनी होगी कि किसी विशेष समय में लोगों में रुचिविशेष क...

हिन्दी साहित्य का इतिहास, रामचंद्र शुक्ल, भाग 04

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  हिन्दी साहित्य का इतिहास, रामचंद्र शुक्ल, भाग 04 दोस्तों यहां पर पिछले तीन भागों के बाद की जानकारी दी गई है, अगर आप चाहते हैं कि पिछले तीन भाग पढ़ें तो निम्नलिखित शीर्षक पर जाए:- महत्वपूर्ण लिंक्स  हिन्दी साहित्य का इतिहास, रामचंद्र शुक्ल, भाग 01 हिन्दी साहित्य का इतिहास, रामचंद्र शुक्ल, भाग 02 हिन्दी साहित्य का इतिहास, रामचंद्र शुक्ल, भाग 03 एक ही काल और एक ही कोटि की रचना के भीतर जहाँ भिन्न-भिन्न प्रकार की परंपराएँ चली हुई पाई गई हैं, वहाँ अलग-अलग शाखाएँ करके सामग्री का विभाग किया गया है। जैसे भक्तिकाल के भीतर पहले तो दो काव्यधाराएँ निर्गुण धारा और सगुण धाराएं निर्दिष्ट की गई हैं। फिर प्रत्येक धारा की दो-दो शाखाएँ स्पष्ट रूप से लक्षित हुई हैं निर्गुण धारा की ज्ञानाश्रयी और प्रेममार्गी (सूफी) शाखा तथा सगुण धारा की रामभक्ति और कृष्णभक्ति शाखा। इन धाराओं और शाखाओं की प्रतिष्ठा यों ही मनमाने ढंग पर नहीं की गई है। उनकी एक-दूसरे एक- से अलग करने वाली विशेषताएँ अच्छी तरह दिखाई भी गई हैं और देखते ही ध्यान में आ भी जाएँगी। रीतिकाल के भीतर रीतिबद्ध रचना की जो परंपरा चली है उसका उपविभ...

हिन्दी साहित्य का इतिहास, रामचंद्र शुक्ल, भाग 03

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हिन्दी साहित्य का इतिहास, रामचंद्र शुक्ल, भाग 03  दोस्तों यहां पर पिछले दो भागों के बाद की जानकारी दी गई है, अगर आप चाहते हैं कि पिछले दो भाग पढ़ें तो निम्नलिखित शीर्षक पर जाए:- हिन्दी साहित्य का इतिहास, रामचंद्र शुक्ल, भाग 01 हिन्दी साहित्य का इतिहास, रामचंद्र शुक्ल, भाग 02 इन्हीं बारह पुस्तकों की दृष्टि से 'आदिकाल' का लक्षण निरूपण और नामकरण हो सकता है। इनमें से अंतिम दो तथा बीसलदेव रासो को छोड़कर शेष सब ग्रंथ वीरगाथात्मक ही हैं। अतः आदिकाल का नाम 'वीरगाथा काल' ही रखा जा सकता है। जिस सामाजिक या राजनैतिक परिस्थिति की प्रेरणा से वीरगाथाओं की प्रवृत्ति रही है उसका सम्यक् निरूपण पुस्तक में कर दिया गया है। मिश्रबंधुओं ने इस 'आदिकाल' के भीतर इतनी पुस्तकों की और नामावली दी है 1. भगवत गीता 2. वृद्ध नवकार 3. वर्तमाल 4. सहमति 5. पत्तालि 6. अनन्य योग 7. जंबूस्वामी रास 8. रैवतगिरि रास 9. नेमिनाथ चउपई 10. उवएस माला (उपदेशमाला)। इनमें से नं. 1 तो पीछे की रचना है, जैसा कि उसकी इस भाषा से स्पष्ट है: तेहि दिन कथा कीन मन लाई। सुमिरौं गुरु गोविंद के पाऊँ। अगम अपार है जाकर नाऊँ हर...

हिन्दी साहित्य का इतिहास, रामचंद्र शुक्ल, भाग 02

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हिन्दी साहित्य का इतिहास, रामचंद्र शुक्ल, भाग 02  पहले कालविभाग को लीजिए। जिस कालविभाग के भीतर किसी विशेष ढंग की रचनाओं की प्रचुरता दिखाई पड़ी है, वह एक अलग काल माना गया है और उसका नामकरण उन्हीं रचनाओं के स्वरूप के अनुसार किया गया है। इसी प्रकार काल का एक निर्दिष्ट सामान्य लक्षण बनाया जा सकता है। किसी एक ढंग की रचना की प्रचुरता से अभिप्राय यह है कि दूसरे ढंग की रचनाओं में से चाहे किसी (एक) ढंग की रचना को लें वह परिमाण में प्रथम के बराबर न होगी, यह नहीं कि और सब ढंगों की रचनाएँ मिलकर भी उसके बराबर न होंगी। जैसे यदि किसी काल में पाँच ढंग की रचनाएँ 10, 5, 6, 7, और 2 के क्रम में मिलती हैं, तो जिस ढंग की रचना की 10 पुस्तकें हैं, उसकी प्रचुरता कही जाएगी, यद्यपि शेष और ढंग की सब पुस्तकें मिलकर 20 हैं। यह तो हुई पहली बात। दूसरी बात है ग्रंथों की प्रसिद्धि। किसी काल के भीतर जिस एक ही ढंग के बहुत अधिक ग्रंथ प्रसिद्ध चले आते हैं, उस ढंग की रचना उस काल के लक्षण के अंतर्गत मानी जाएगी, चाहे और दूसरे ढंग की अप्रसिद्ध और साधारण कोटि की बहुत-सी पुस्तकें भी इधर-उधर कोनों में पड़ी मिल जाया करें। प्रस...

हिन्दी साहित्य का इतिहास, रामचंद्र शुक्ल

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प्रथम संस्करण का वक्तव्य हिंदी कवियों का एक वृत्तसंग्रह ठाकुर शिवसिंह सेंगर ने सन् 1833 ई. में प्रस्तुत किया था। उसके पीछे सन् 1889 में डॉक्टर (अब सर) ग्रियर्सन ने 'मॉडर्न वर्नाक्युलर लिटरेचर ऑव नार्दर्न हिंदुस्तान' के नाम से एक वैसा ही बड़ा कविवृत्त-संग्रह निकाला। काशी की नागरीप्रचारिणी सभा का ध्यान आरंभ ही में इस बात की ओर गया कि सहस्रों हस्तलिखित हिंदी पुस्तकें देश के अनेक आगों में, राजपुस्तकालयों तथा लोगों के घरों में अज्ञात पड़ी हैं। अतः सरकार की आर्थिक सहायता से उसने सन् 1900 से पुस्तकों की खोज का काम हाथ में लिया और सन्‌ 1911 तक अपनी खोज की आठ रिपोर्टों में सैकड़ों अज्ञात कवियों तथा ज्ञात कवियों के अज्ञात संर्थों का पता लगाया। सन् 1913 में इस सारी सामग्री का उपयोग करके मिश्रबंधुओं (श्रीयुत् पं श्यामबिहारी मिश्र आदि) ने अपना बड़ा भारी कविवृत्त-संग्रह 'मिश्रबंधु विनोद', जिसमें वर्तमान काल के कवियों और लेखकों का भी समावेश किया गया है, तीन भागों में प्रकाशित किया। Go to channel इधर जब से विश्ववि‌द्यालयों में हिंदी की उच्च शिक्षा का विधान हुआ, तब से उसके साहित्य के वि...

हिन्दी साहित्य से संबंधित महत्वपूर्ण प्रश्न

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  हिन्दी साहित्य के लेखक और उनके ग्रन्थ हिंदी की कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां........... Go to channel रेती के फूल__________ :-रामधारी सिंह दिनकर अशोक के फूल________:- हजारी प्रसाद द्विवेदी कमल के फूल________ :-भवानी प्रसाद मिश्र शिरीष के फूल________:- हजारी प्रसाद द्विवेदी कागज के फूल________ :-भारत भूषण अग्रवाल जूही के फूल__________:- रामकुमार वर्मा गुलाब के फूल_________:-उषा प्रियवंदा नीम के फूल___________:- गिरिराज किशोर खादी के फूल__________:- हरिवंशरायबच्चन जंगल के फूल__________:- राजेंद्र अवस्थी दुपहरिया के फूल_______:- दुर्गेश नंदिनी डालमिया चिता के फूल__________ :-रामवृक्ष बेनीपुरी सेमल के फूल _________:-मारकंडे सुबह के फूल__________:- महीप सिंह रक्त के फूल____________ :-योगेश कुमार खादी के गीत__________:-सोहनलाल उसने कहा था_________ :-चंद्रधर शर्मा गुलेरी उसने नहीं कहा था ______:-शैलेश मटियानी तुमने कहा था ___________:-नागार्जुन मैंने कब कहा_____________ :-सर्वेश्वर दयाल सक्सेना तुमने क्यों कहा कि मैं सुंदर हूँ____:-यशपाल उसकी कहानी _____________:-महेंद्र वशिष्ट उसका विद्रोह...

ईदगाह, प्रेमचंद ईदगाह प्रेमचंद की कहानी

ईदगाह प्रेमचंद नोट:- और कहानियां पढ़ने के लिए सब्सक्राइब करें।  प्रेमचंद के कहानी संग्रह रमज़ान के पूरे तीस रोज़ों के बाद ईद आई है। कितना मनोहर, कितना सुहावना प्रभात है। वृक्षों पर अजीब हरियाली है, खेतों में कुछ अजीब रौनक़ है, आसमान पर कुछ अजीब लालिमा है। आज का सूर्य देखो, कितना प्यारा, कितना शीतल है, यानी संसार को ईद की बधाई दे रहा है। गाँव में कितनी हलचल है। ईदगाह जाने की तैयारियाँ हो रही हैं। किसी के कुरते में बटन नहीं है, पड़ोस के घर में सुई-तागा लेने दौड़ा जा रहा है। किसी के जूते कड़े हो गए हैं, उनमें तेल डालने के लिए तेली के घर पर भागा जाता है। जल्दी-जल्दी बैलों को सानी-पानी दे दें। ईदगाह से लौटते-लौटते दुपहर हो जाएगी।  तीन कोस का पैदल रास्ता, फिर सैकड़ों आदमियों से मिलना-भेंटना। दुपहर के पहले लौटना असंभव है।  लड़के सबसे ज़्यादा प्रसन्न हैं। किसी ने एक रोज़ा रखा है, वह भी दुपहर तक, किसी ने वह भी नहीं, लेकिन ईदगाह जाने की ख़ुशी उनके हिस्से की चीज़ है।  रोज़े बड़े-बूढ़ों के लिए होंगे, इनके लिए तो ईद है। रोज़ ईद का नाम रटते थे, आज वह आ गई।  अब जल्दी पड़ी है क...